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Monday, September 14, 2015

उन्मुक्त

कलम ने उठकर
चुपके से कोरे कागज़ से कुछ कहा
और मैं स्याही बनकर बह चली
मधुर स्वछ्न्द गीत गुनगुनाती,
उड़ते पत्तों की नसों में लहलहाती।
उल्लसित जोशीले से
ये चल पड़े हवाओं पर
अपनी कहानियाँ लिखने।
सितारों की धूल
इन्हें सहलाती रही।
कलम मन ही मन
मुस्कुराती रही
गीत गाती रही।
-मीना 

Friday, July 18, 2014

तीर्थ

सौंधी हवा का झोंका

मेरे आँचल में 
फिसल कर आ गिरा।
     वक्त का एक मोहरा हो गया।
     और फिर
     फ़िज़ाओं की चादर पर बैठा
     हवाओं को चूमता
     आसमानों की सरहदों में कहीं

Thursday, May 15, 2014

अघटनीय -


Sunday, April 20, 2014

अवशेष

वक्त खण्डित था, युगों में !
टूटती रस्सियों में बंध चुका था 
अँधेरे इन रस्सियों को निगल रहे थे
तब !
जीवन तरंग में अविरत मैं
तुम्हारे कदमों में झुकी हुई
तुम्हीं में प्रवाहित
तुम्हीं में मिट रही थी
तुम्हीं में बन रही थी|
तुम्हीं से अस्त और उदित मैं
तुम्हीं में जल रही थी
तुम्हीं में बुझ रही थी! 
कुछ खाँचे बच गए थे                                 
कई कहानियाँ तैर रही थीं जिनमें                       
उन्ही मे हमारी कहानी भी                             
अपना किनारा ढूँढती थी! 
एक अंत !                                           जिसका आरम्भ,                                     
दृष्टि और दृश्य से ओझल                             
भविष्य और भूत की धुन्ध में लिपटा                     मद्धम सा दिखाई देता था।  
अविरल !
शायद एक स्वप्न लोक ! 
और तब आँख खुल गई
हम अपनी तकदीरों में जग गए।
टुकड़े - टुकड़े                                                                 ज़मीं पर बिखर गए                                                            
-मीना                                                                                                                                              


Wednesday, April 2, 2014

माणिक

सपनों के सपाट कैनवास पर

रेखाएँ खींचता
असीम स्पर्श तुम्हारा
कभी झिंझोड़ता
कभी थपथपाता
कुछ खाँचे बनाता
आँकता हुआ चिन्हों को
रंगों से तरंगों को भिगोता रहा
एक रात का एक मख़मली एहसास।


कच्ची पक्की उम्मीदों में बँधा
सतरंगी सा उमड़ता आवेग
एक छलकता, प्रवाहित इंद्रधनुष
झलकता रहा गली-कूचों में
बिखरी सियाह परछाइयों
के बीच कहीं दबा दबा।


रात रोशन थी
श्वेत चाँदनी सो रही थी मुझमें
निष्कलंक!
अँधेरों की मुट्ठी में बंद
जैसे माणिक हो सर्प के
फन से उतरा हुआ।

Sunday, March 23, 2014

आनन्द मठ

मीना द्वारा निर्मित पेस्टल ऑन पेपर 
हाथों की वो छुअन और गरमाहटें
बन्द है मुट्ठी में अबतक                          
          ज्योतिर्मय हो चली हैं
            हथेली में रक्खी रेखाएँ।
         लाखों जुगनू हवाओं में भर गए हैं
           तक़दीरें उड़ चली हैं आसमानों में
            सर्दियों की कोसी धूप
             छिटक रही है दहलीज़ तक,

         और तुम – कहीं दूर –
           मेरी रूह में अंकित
            आकाश-रेखा पर चलते हुए –
             एक बिंदु में ओझल होते चले गए।

       डूब चुके हो
        जहाँ नियति –
          सागर की बूँदों में तैरती है।
      
     मेरी मुट्ठी में बंधी रेखाएँ
      ज्योतिर्मय हो चुकी हैं।
       तुम्हारी धूप
        मुझमें आ रुकी है।
-मीना चोपड़ा 


Sunday, March 16, 2014

अमावस को—

मीना चोपड़ा द्वारा निर्मित तैलचित्र 
अमावस को—
तारों से गिरती धूल में
चांदनी रात का बुरादा शामिल कर 
एक चमकीला अबीर 
बना डाला मैने
उजला किया इसको मलकर
रात का चौड़ा माथा।

Saturday, March 15, 2014

वो हल्का सा गुलाल-

''होली आई रे आई होली आई रे '' (चर्चा मंच-1554)

आँखों की जलती बुझती रौशानी के बीच कहीं 
पेस्टल चित्र - मीना द्वारा रचित  
वो हल्का सा गुलाल-
क्षितिज के मद्धम से अंधरों को अपने में समेटे 
चाँद की पेशानी पर 
टिमटिमाता है अबीर बन 
हर पूनम को
वो हल्का सा गुलाल- 

आस लगाये बैठी हूँ
उस होली की सुबह का 
जब ये चाँद पूनम से उतर कर 
अमावास के गुलाल में सितारे भरकर
मेरे मन के अंधेरों की पेशानी पर 
इन्द्रधनुश सा रौशन होगा। 

मेरा जीवन
अमावास से बने उजालों के 
एक अथाह सागर में भीगा होगा। 

-मीना चोपड़ा 

Thursday, March 13, 2014

उन्मुक्त

कलम ने उठकर

Drawing by Meena
चुपके से कोरे कागज़ से कुछ कहा
और मैं स्याही बनकर बह चली
           मधुर स्वछ्न्द गीत गुनगुनाती,
                     उड़ते पत्तों की नसों में लहलहाती।
उल्लसित जोशीले से
ये चल पड़े हवाओं पर
अपनी कहानियाँ लिखने।
           सितारों की धूल
                      इन्हें सहलाती रही।
कलम मन ही मन
             मुस्कुराती रही
                       गीत गाती रही।
-मीना चोपड़ा 

Wednesday, March 12, 2014

कविता

Pastel by Meena

वक्त की सियाही में

तुम्हारी रोशनी को भरकर
समय की नोक पर रक्खे
शब्दों का कागज़ पर
कदम-कदम चलना।

एक नए वज़ूद को
मेरी कोख में रखकर
माहिर है कितना
इस कलम का
मेरी उँगलियों से मिलकर
तुम्हारे साथ-साथ 
यूँ सुलग सुलग चलना |

-©मीना चोपड़ा 

Tuesday, March 11, 2014

और कुछ भी नहीं

Pastel on paper by Meena Chopra
ख़यालों में डूबे
वक्त की सियाही में
कलम को अपनी डुबोकर
आकाश को रोशन कर दिया था मैंने

Monday, March 10, 2014

पिघलता सूरज

Oil on Canvas by Meena
एक पिघलता सूरज देखा है मैंने
तुम्हारी आँखों के किनारे पर।कभी देखा है किनारों से पिघलता रंग
गिरकर दरिया में बहता हुआ
और कभी
दरिया को इन्हीं रंगों में बहते देखा है
देखा है जो कुछ भी
बस बहता ही देखा है।
-©मीना चोपड़ा

Sunday, March 2, 2014

शून्य की परछाईं

English: Red sunrise over Oostende, Belgium
 (Photo credit: Wikipedia)
सितारों में लीन हो चुके हैं स्याह सन्नाटे
ख़लाओं को हाथों में थामें
दिन फूट पड़ा है लम्हा - लम्हा
      रोशनी को अपनी
      ढलती चाँदनी की चादर पर बिखराता

Friday, February 28, 2014

औरत

ये वह शक्ति है जिसकी कोख में जीवन पनपता है 
मीना द्वारा 
निमित पेस्टल चित्र  
वो ताकत है 
जो सितारों भरी क़ायनात को जन्म देती है,
जीवन को जगमगाहट और नज्जारों  को इल्म देती है,
धरा पे उगते फूलों, पौधों और पेड़ों को सींच देती है
कहीं शबरी, कहीं मीरा, तो कहीं रानी झाँसी का रूप लेती है
ये औरत है जो रण में जाते वीरों को विजय तिलक देती है
ये औरतहै, निर्भय है,

निर्भयता को जन्म देती है।
-©मीना चोपड़ा 


ओस की एक बूँद

Pastel by Meena
ओस में डूबता अंतरिक्ष
विदा ले रहा है
अँधेरों पर गिरती तुषार
और कोहरों की नमी से।


और यह बूँद न जाने
कब तक जियेगी
इस लटकती टहनी से
जुड़े पत्ते के आलिंगन में।

धूल में जा गिरी तो फिर
मिट के जाएगी कहाँ?

ओस की एक बूँद
बस चुकी है कब की

मेरे व्याकुल मन में।

-©मीना चोपड़ा 

Thursday, February 27, 2014

बहती खलाओं का वो आवारा टुकड़ा

कभी देखा था इसे 
Golden Valley, AZ sunset funnel cloudपलक झपकती रौशानी के बीच 
कहीं छुपछूपाते हुए,   
जहां क्षितिज के सीने में उलझी मृगत्रिष्णा 
ढलती शाम के क़दमों में दम तोड़ देती है। 

और कभी 
हवा के झोंकों में लिपटे 
पत्तों की सरसराहट में 
इसकी मध्धम सी आवाज़ भी सुनी थी मैंने 

दुशाला

Sunrise over the south beach of Jamaica.
 Photo credit: Wikipedia
अंधेरों का दुशाला
मिट्टी को मेरी ओढ़े
अपनी सिलवटों के बीच
खुद ही सिमटता चला गया

और कुछ झलकती
परछाइयों की सरसराहट,
सरकती हुई
इन सिलवटों में
गुम होती चली गयी|

प्रज्ज्वलित कौन?

Pastel on paper by Meena
देह मेरी
कोरी मिट्टी!
धरा से उभरी,
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे हाथों तक
जीवन धारा से
सिंचित हुई यह मिट्टी।